Tuesday, July 3, 2012

"घर की दीवारें बोलती है"

मै अकेला हूँ
न जाने कब से
इस अजनबियों के शहर में !
मै भी हूँ एक अजनबी
होती है घुटन
बंद कमरे में बुत बनी दीवारों से !
या बाहर भी
भीड़ भरे बाज़ारों में,
रास्ते में पड़े पत्थर की तरह ,
सोचता हूँ शहरें देती हैं तोहफा,
वर्षों बीत जायेंगें पर तुम रहोगे नए
ये नयापन तुम्हें हर पल
चौकस रखेंगी,निगाहें शशंकित रहेंगी !
गुमनामी की जिंदगी यूँ सफ़र में होगी ही ,
रास्ते कट जायेंगे अकेले ही मंजिल पा जाओगे !
अब भला कौन समझे,
सफ़र में हमसफ़र जरूरत है इन्सां की
जैसे जरूरत दिए में तेल की
हवा ,जल,भोजन,की तरह जरूरत है एक रहगुजर की !
यदि मुझे यहाँ जीना है तो  
तो कुछ खोना और कुछ पाना 
है !
वर्षों से चुप हूँ चौराहे पर खड़े बुत की तरह,
जहाँ परिंदा भी अपना आशियाना नहीं बना सकता !
प्रतीक्षा का अनन्त प्रवाह शहरों में होगी ही,
करता हूँ तैयारी घर लौटने की,
बेकार सा ही सही वहीँ रहूँगा ,
घर की बातें कुछ और है घर की दीवारें बोलती है  !!  

                                                                     ~भागलपुर से ~

Wednesday, April 25, 2012

~माँ ~

मेरी ख्वाहिश है की मै 
           फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं
माँ से इस तरह लिपट जाऊं
            की बच्चा हो जाऊं !!

मै एक छोटा बच्चा था
            तेरी उंगली थाम के चलता था
तू दूर नज़र से होती थी
            मै आंसू आंसू रोता था !!

एक ख्वाब का रौशन बस्ता
            तू रोज मुझे पहनाती थी
जब डरता था मै रातों में
            तू अपने साथ सुलाती थी !!
 
माँ  तूने कितने वर्षों तक
            इस फूल को सींचा हाथों से
जीवन के गहरे भेदों को
           मै समझा तेरी बातों से !!

मै तेरे हाथ की तकिये पर
           अब भी रात को सोता हूँ
माँ मै छोटा सा एक बच्चा
           तेरी याद में अब भी
रोता हूँ !!
                                           
                                      सौजन्य "निदा फ़ाज़ली"

http://www.facebook.com/myth.vikas