Monday, July 18, 2011

~प्यार का कोंपल ~

आओ सखी बाँध लो मुझे
तू ..........निज बंधन में
मै हूँ आज स्वतंत्र गगन में
आओ न संग करे विहार गगन में
बिन तेरे गति नहीं मेरे पंखों में

रंगों की इस दुनिया में,
अभी तक हूँ बेदाग सखी
जीवन की इस बेला में
भर दो न रंगों से पोर-पोर हे सखी

इससे पहले की सूर्य ढले
जीवन की यह उमंग ढले
आओ न बाँध लो- मुझे निज बंधन में
मै हूँ आज स्वतंत्र सखी

जीवन की यह मेरी परिधि,
जिसपर कहीं न कही तो खड़ी होगी ही मेरी सखी
इससे पहले की गुजर जाये मेरा कारवां
आँखे खुली तू रखना हे सखी

जब मिलेंगे तब मिलेंगे
अभी तलक तो तेरा ही इंतज़ार है सखी
न जाने तू मिलोगी किस मोड़ पर
आखिर कब समझोगी मेरा दर्द सखी !!

निश्छल हूँ निष्पापी हूँ,गरिमा के गौरव से मंडित हूँ
क्या ? इसलिए तू मुझसे दूर सखी

अधरों पर मुस्कान सहित
मेरा मन चाहे हो कितना भी दुखित
गरिमा को नहीं होने दूंगा खंडित
मौन करता रहूँगा .........
.....................इंतज़ार सखी !!

Sunday, July 17, 2011

****गुफ्तुगू ****

खुद ही खुद से उलझता चला गया ,
जितना सुलझाया जीवन को !
जो राह बनाया चलने को,
राहें बन अभिसप्त लगी दरकने को !
जब भी किया संकल्प,
कुछ जीवन में ओज भरने को !
मन हरा दिल टुटा लगे तारे छिटकने को
हरयाली देखी....
दौड़ लगाया पाने को,
निराश हुआ पाया मृगतृष्णा को !
नभ की और उठे हाँथ.........
ऊंचाई पाने को !
बाहें छोटी पर गयी,
खोया आत्मविश्वास,घुटने टेके
आँखे थक गयी संबल पाने को !
खिले पुष्प लगे कुम्हलाने,
भ्रमर उड़े नया ठौर पाने को !
शाखों के पत्ते रह गए वहीँ,
फल चले गए शहरी बन जाने को !
निष्ठुर जीवन के भाव लिए,
मै लौट चला घर सुस्ताने को ....!
निष्ठुर जीवन के भाव लिए,
मै लौट चला घर सुस्ताने को......!!