आओ सखी बाँध लो मुझे
तू ..........निज बंधन में
मै हूँ आज स्वतंत्र गगन में
आओ न संग करे विहार गगन में
बिन तेरे गति नहीं मेरे पंखों में
रंगों की इस दुनिया में,
अभी तक हूँ बेदाग सखी
जीवन की इस बेला में
भर दो न रंगों से पोर-पोर हे सखी
इससे पहले की सूर्य ढले
जीवन की यह उमंग ढले
आओ न बाँध लो- मुझे निज बंधन में
मै हूँ आज स्वतंत्र सखी
जीवन की यह मेरी परिधि,
जिसपर कहीं न कही तो खड़ी होगी ही मेरी सखी
इससे पहले की गुजर जाये मेरा कारवां
आँखे खुली तू रखना हे सखी
जब मिलेंगे तब मिलेंगे
अभी तलक तो तेरा ही इंतज़ार है सखी
न जाने तू मिलोगी किस मोड़ पर
आखिर कब समझोगी मेरा दर्द सखी !!
निश्छल हूँ निष्पापी हूँ,गरिमा के गौरव से मंडित हूँ
क्या ? इसलिए तू मुझसे दूर सखी
अधरों पर मुस्कान सहित
मेरा मन चाहे हो कितना भी दुखित
गरिमा को नहीं होने दूंगा खंडित
मौन करता रहूँगा .........
.....................इंतज़ार सखी !!

2 comments:
विकास जी !
बहुत अच्छी रचना के लिए धन्यवाद...
मैंने आपका ब्लॉग देखा देख कर खुशी हुई कि एक नवोदित ब्लॉगर हैं पर दुख भी हुआ कि आपकी रचनाओं को कोई नहीं देखता, कोई कमेंट भी नहीं करता। आपसे गुजारिश है कि आप मुझसे फेसबुक मे जुड़ें। मैं हिन्दी के नए ब्लौगरों के लिए कुछ बड़े ब्लौगर्स के साथ मिल के "हिन्दी ब्लॉगिंग गाइड" नामक किताब लिख रहा हूँ। आशा है कि आपको यह किताब पसंद आएगी।
- महेश बारमाटे "माही"
आपकी रचनाओं को और भी रिसपोन्स दिलवाने के लिए बहुत जल्द आपके समक्ष प्रस्तुत होऊंगा...
आपके प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद ।उम्मीद है आप नवोदितोँ के अच्छे मार्गदर्शक बने रहेँगे ।
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