Friday, August 30, 2013

~खोया हुआ सा कुछ~

मुदत्तें बीत गयी
तुम्हारी आवाज आज भी कानों में गूंजती है !
 

शुक्रगुजार हूँ मैं उन तमाम अवसरों का,
जिसने मुझे मुझसे मिलाया
ताउम्र विनम्र और शांत रहना सिखाया !
 

गर हम तुमसे न मिले होते
एक अनोखे अनुभव से चुक गए होते !
 

तुम नहीं हो अब और होने की खुशफहमी भी है,
अब पहले से ज्यादा जिन्दगी लगती हसीन है !
 

तुम थी कितनी समझदार जो कर गयी इनकार,
बता गई इस राह में कांटें हैं बेशुमार !
 

आज भी हम उन उसूलों के पक्के हैं,
प्यार वाली राह छोड़ बढ़ चले मंजिल की ओर !
सजदे की मूरत फिर कभी मुड़ कर नहीं देखें है !!
 

यह अहम् नहीं मेरा न त्याग कहें,
जिसका न आदि न अंत कुछ ऐसा प्यार कहें !!
                                  ~~विकास~~ 

                                    जमशेदपुर

Tuesday, July 3, 2012

"घर की दीवारें बोलती है"

मै अकेला हूँ
न जाने कब से
इस अजनबियों के शहर में !
मै भी हूँ एक अजनबी
होती है घुटन
बंद कमरे में बुत बनी दीवारों से !
या बाहर भी
भीड़ भरे बाज़ारों में,
रास्ते में पड़े पत्थर की तरह ,
सोचता हूँ शहरें देती हैं तोहफा,
वर्षों बीत जायेंगें पर तुम रहोगे नए
ये नयापन तुम्हें हर पल
चौकस रखेंगी,निगाहें शशंकित रहेंगी !
गुमनामी की जिंदगी यूँ सफ़र में होगी ही ,
रास्ते कट जायेंगे अकेले ही मंजिल पा जाओगे !
अब भला कौन समझे,
सफ़र में हमसफ़र जरूरत है इन्सां की
जैसे जरूरत दिए में तेल की
हवा ,जल,भोजन,की तरह जरूरत है एक रहगुजर की !
यदि मुझे यहाँ जीना है तो  
तो कुछ खोना और कुछ पाना 
है !
वर्षों से चुप हूँ चौराहे पर खड़े बुत की तरह,
जहाँ परिंदा भी अपना आशियाना नहीं बना सकता !
प्रतीक्षा का अनन्त प्रवाह शहरों में होगी ही,
करता हूँ तैयारी घर लौटने की,
बेकार सा ही सही वहीँ रहूँगा ,
घर की बातें कुछ और है घर की दीवारें बोलती है  !!  

                                                                     ~भागलपुर से ~

Wednesday, April 25, 2012

~माँ ~

मेरी ख्वाहिश है की मै 
           फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं
माँ से इस तरह लिपट जाऊं
            की बच्चा हो जाऊं !!

मै एक छोटा बच्चा था
            तेरी उंगली थाम के चलता था
तू दूर नज़र से होती थी
            मै आंसू आंसू रोता था !!

एक ख्वाब का रौशन बस्ता
            तू रोज मुझे पहनाती थी
जब डरता था मै रातों में
            तू अपने साथ सुलाती थी !!
 
माँ  तूने कितने वर्षों तक
            इस फूल को सींचा हाथों से
जीवन के गहरे भेदों को
           मै समझा तेरी बातों से !!

मै तेरे हाथ की तकिये पर
           अब भी रात को सोता हूँ
माँ मै छोटा सा एक बच्चा
           तेरी याद में अब भी
रोता हूँ !!
                                           
                                      सौजन्य "निदा फ़ाज़ली"

http://www.facebook.com/myth.vikas   

Monday, July 18, 2011

~प्यार का कोंपल ~

आओ सखी बाँध लो मुझे
तू ..........निज बंधन में
मै हूँ आज स्वतंत्र गगन में
आओ न संग करे विहार गगन में
बिन तेरे गति नहीं मेरे पंखों में

रंगों की इस दुनिया में,
अभी तक हूँ बेदाग सखी
जीवन की इस बेला में
भर दो न रंगों से पोर-पोर हे सखी

इससे पहले की सूर्य ढले
जीवन की यह उमंग ढले
आओ न बाँध लो- मुझे निज बंधन में
मै हूँ आज स्वतंत्र सखी

जीवन की यह मेरी परिधि,
जिसपर कहीं न कही तो खड़ी होगी ही मेरी सखी
इससे पहले की गुजर जाये मेरा कारवां
आँखे खुली तू रखना हे सखी

जब मिलेंगे तब मिलेंगे
अभी तलक तो तेरा ही इंतज़ार है सखी
न जाने तू मिलोगी किस मोड़ पर
आखिर कब समझोगी मेरा दर्द सखी !!

निश्छल हूँ निष्पापी हूँ,गरिमा के गौरव से मंडित हूँ
क्या ? इसलिए तू मुझसे दूर सखी

अधरों पर मुस्कान सहित
मेरा मन चाहे हो कितना भी दुखित
गरिमा को नहीं होने दूंगा खंडित
मौन करता रहूँगा .........
.....................इंतज़ार सखी !!

Sunday, July 17, 2011

****गुफ्तुगू ****

खुद ही खुद से उलझता चला गया ,
जितना सुलझाया जीवन को !
जो राह बनाया चलने को,
राहें बन अभिसप्त लगी दरकने को !
जब भी किया संकल्प,
कुछ जीवन में ओज भरने को !
मन हरा दिल टुटा लगे तारे छिटकने को
हरयाली देखी....
दौड़ लगाया पाने को,
निराश हुआ पाया मृगतृष्णा को !
नभ की और उठे हाँथ.........
ऊंचाई पाने को !
बाहें छोटी पर गयी,
खोया आत्मविश्वास,घुटने टेके
आँखे थक गयी संबल पाने को !
खिले पुष्प लगे कुम्हलाने,
भ्रमर उड़े नया ठौर पाने को !
शाखों के पत्ते रह गए वहीँ,
फल चले गए शहरी बन जाने को !
निष्ठुर जीवन के भाव लिए,
मै लौट चला घर सुस्ताने को ....!
निष्ठुर जीवन के भाव लिए,
मै लौट चला घर सुस्ताने को......!!

Monday, May 31, 2010

" जुगनूँ "

तुम थे कितने अच्छे
हाँ लोग हो जाते हैरान,
तुम आये थे यहाँ
सिखाने
कि ये सब जो फितरत है ...
उसके आदि न बनो,
किसी से इतना प्यार न करो,
जिसके बिना तुम जी न सको,
ये बेचैनी ये उदासी
किसलिए देते गए तुम ,
क्या ? ये तेरी अमानत समझ
रगों में पालता रहूँ !
शायद तुम होके अपने कहीं
ओझल हो जाते यह कहते कि..
मै जा रहा हूँ अब न आऊंगा,
मौका तो देते कुछ पल मानाने को
शायद तुम जानते थे
मै न जाने देता तुम्हें !
ये रंज और गिला होके भी
 न रहा अब !
गर्द उठती है इस जिस्म कि,
तुम न रहे तो..
खो गयी मेरी शर्मिंदगी,
वो हया वो सलीका न रहा अब !!
---------"विकास"----------------- 
(मेरे दिवंगत दोस्त "प्रवीन" कि याद में )

Saturday, May 29, 2010

"प्रिय तुम हो कहाँ "

आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
करूँ किस नाम श्रृंगार,
किसके लिए गाऊं गीत मल्हार,
किस मुख कहूँ कोई शुभ विचार !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
हरे हुए आज जख्म मेरे ,
बह उठे आज अक्स मेरे,
की हटती नहीं यादों से उनके चेहरे,
क्यों ? मेरे निकट तू आती हो,
मन क तार छेड़ छुप जाती हो !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
स्वर्ग सा सुख चाहे यह जगसारा,
स्वर्ग नहीं तू है मेरी अभिलाषा,
न जाने तू मुझे क्यों तडपाती हो,
पता नहीं ऐसा कर कौन सा सुख पाती हो,
पहले तो तू इठलाती हो,
थोडा सा भरमाती हो,
आगे चल भटकाती हो !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
क्या तेरी परिभाषा है ?
आज जानने की अभिलाषा है,
इतना सामर्थ्य नहीं मुझमे,
की नाप सकूँ,कितना गुण है तुझमे,
तेरे बिना किसी को भी,
जीवन जी लेने की हस्ती है,
तू ही जीवन की शक्ति है,
तू ही भगवन की भक्ति है !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
इजहार न कर पाने से आहत है,
दिया दुःख तुमको से भी आहत है,
हे भगवन,छिपा रखा था तुने कितना,
अपना लाज मेरे मन में,
हाय ये लाज डूबा गयी मुझे क्षण में,
क्या लिखूं इस बंजर वन में ?
क्या देखूं इस सूखे वन में ?
नफरत हो चुकी इस जीवन में !!
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
की क्यों हो इतनी दूर ,
जो सुन सको मेरी बोली,
बड़ी याद आती है तेरी वो सूरत भोली,
हे भगवन,तेरे द्वारे फैलाता हूँ झोली,
लौटा दे मुझको वो जिनकी सूरत थी भोली,
मन की ये आस हरी,
दिल की ये टीस हरी,
नैनों में है तेरी छवि.
पर तू अब न लौटोगी कभी,
भगवान् करे तुझे मिल जाये मुझ सा !
समझूंगा जीवन का अब दर्द रहा कैसा !
कहतें हैं मेहनत का फल मीठा होता है ,
जो भी खोजो वो मिलता है,
तुझको मै ढूढू कहाँ ?
बहुत बड़ा है ये जहां !
प्रिय तुमको मेरी कसम !
बता दो न तुम हो कहाँ !!
--------------*विकास *-------