Monday, May 31, 2010

" जुगनूँ "

तुम थे कितने अच्छे
हाँ लोग हो जाते हैरान,
तुम आये थे यहाँ
सिखाने
कि ये सब जो फितरत है ...
उसके आदि न बनो,
किसी से इतना प्यार न करो,
जिसके बिना तुम जी न सको,
ये बेचैनी ये उदासी
किसलिए देते गए तुम ,
क्या ? ये तेरी अमानत समझ
रगों में पालता रहूँ !
शायद तुम होके अपने कहीं
ओझल हो जाते यह कहते कि..
मै जा रहा हूँ अब न आऊंगा,
मौका तो देते कुछ पल मानाने को
शायद तुम जानते थे
मै न जाने देता तुम्हें !
ये रंज और गिला होके भी
 न रहा अब !
गर्द उठती है इस जिस्म कि,
तुम न रहे तो..
खो गयी मेरी शर्मिंदगी,
वो हया वो सलीका न रहा अब !!
---------"विकास"----------------- 
(मेरे दिवंगत दोस्त "प्रवीन" कि याद में )

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