आसमान अनंत है !
उगते सूरज के नीचे,
जन सागर है,
फिर भी पाता,
अपने को,
अकेला,
अपरिचित !
क्योंकि मेरे पास ,
न धन है न दौलत है !
न अधिकार है न चालाकी !
और मैंने,
न झुकना सिखा है !
न तारीफ करना !
न अपने को बेचना !
मेरे साथ ,
सिर्फ सपने !
जो हैं मेरे अपने !!
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विकास कुमार
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