
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
करूँ किस नाम श्रृंगार,
किसके लिए गाऊं गीत मल्हार,
किस मुख कहूँ कोई शुभ विचार !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
हरे हुए आज जख्म मेरे ,
बह उठे आज अक्स मेरे,
की हटती नहीं यादों से उनके चेहरे,
क्यों ? मेरे निकट तू आती हो,
मन क तार छेड़ छुप जाती हो !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
स्वर्ग सा सुख चाहे यह जगसारा,
स्वर्ग नहीं तू है मेरी अभिलाषा,
न जाने तू मुझे क्यों तडपाती हो,
पता नहीं ऐसा कर कौन सा सुख पाती हो,
पहले तो तू इठलाती हो,
थोडा सा भरमाती हो,
आगे चल भटकाती हो !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
क्या तेरी परिभाषा है ?
आज जानने की अभिलाषा है,
इतना सामर्थ्य नहीं मुझमे,
की नाप सकूँ,कितना गुण है तुझमे,
तेरे बिना किसी को भी,
जीवन जी लेने की हस्ती है,
तू ही जीवन की शक्ति है,
तू ही भगवन की भक्ति है !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
इजहार न कर पाने से आहत है,
दिया दुःख तुमको से भी आहत है,
हे भगवन,छिपा रखा था तुने कितना,
अपना लाज मेरे मन में,
हाय ये लाज डूबा गयी मुझे क्षण में,
क्या लिखूं इस बंजर वन में ?
क्या देखूं इस सूखे वन में ?
नफरत हो चुकी इस जीवन में !!
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
की क्यों हो इतनी दूर ,
जो सुन सको मेरी बोली,
बड़ी याद आती है तेरी वो सूरत भोली,
हे भगवन,तेरे द्वारे फैलाता हूँ झोली,
लौटा दे मुझको वो जिनकी सूरत थी भोली,
मन की ये आस हरी,
दिल की ये टीस हरी,
नैनों में है तेरी छवि.
पर तू अब न लौटोगी कभी,
भगवान् करे तुझे मिल जाये मुझ सा !
समझूंगा जीवन का अब दर्द रहा कैसा !
कहतें हैं मेहनत का फल मीठा होता है ,
जो भी खोजो वो मिलता है,
तुझको मै ढूढू कहाँ ?
बहुत बड़ा है ये जहां !
प्रिय तुमको मेरी कसम !
बता दो न तुम हो कहाँ !!
--------------*विकास *-------