Monday, May 31, 2010

" जुगनूँ "

तुम थे कितने अच्छे
हाँ लोग हो जाते हैरान,
तुम आये थे यहाँ
सिखाने
कि ये सब जो फितरत है ...
उसके आदि न बनो,
किसी से इतना प्यार न करो,
जिसके बिना तुम जी न सको,
ये बेचैनी ये उदासी
किसलिए देते गए तुम ,
क्या ? ये तेरी अमानत समझ
रगों में पालता रहूँ !
शायद तुम होके अपने कहीं
ओझल हो जाते यह कहते कि..
मै जा रहा हूँ अब न आऊंगा,
मौका तो देते कुछ पल मानाने को
शायद तुम जानते थे
मै न जाने देता तुम्हें !
ये रंज और गिला होके भी
 न रहा अब !
गर्द उठती है इस जिस्म कि,
तुम न रहे तो..
खो गयी मेरी शर्मिंदगी,
वो हया वो सलीका न रहा अब !!
---------"विकास"----------------- 
(मेरे दिवंगत दोस्त "प्रवीन" कि याद में )

Saturday, May 29, 2010

"प्रिय तुम हो कहाँ "

आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
करूँ किस नाम श्रृंगार,
किसके लिए गाऊं गीत मल्हार,
किस मुख कहूँ कोई शुभ विचार !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
हरे हुए आज जख्म मेरे ,
बह उठे आज अक्स मेरे,
की हटती नहीं यादों से उनके चेहरे,
क्यों ? मेरे निकट तू आती हो,
मन क तार छेड़ छुप जाती हो !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
स्वर्ग सा सुख चाहे यह जगसारा,
स्वर्ग नहीं तू है मेरी अभिलाषा,
न जाने तू मुझे क्यों तडपाती हो,
पता नहीं ऐसा कर कौन सा सुख पाती हो,
पहले तो तू इठलाती हो,
थोडा सा भरमाती हो,
आगे चल भटकाती हो !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
क्या तेरी परिभाषा है ?
आज जानने की अभिलाषा है,
इतना सामर्थ्य नहीं मुझमे,
की नाप सकूँ,कितना गुण है तुझमे,
तेरे बिना किसी को भी,
जीवन जी लेने की हस्ती है,
तू ही जीवन की शक्ति है,
तू ही भगवन की भक्ति है !
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
इजहार न कर पाने से आहत है,
दिया दुःख तुमको से भी आहत है,
हे भगवन,छिपा रखा था तुने कितना,
अपना लाज मेरे मन में,
हाय ये लाज डूबा गयी मुझे क्षण में,
क्या लिखूं इस बंजर वन में ?
क्या देखूं इस सूखे वन में ?
नफरत हो चुकी इस जीवन में !!
आज मेरा मन आहत है,
मदिरा को चखने की चाहत है !!
की क्यों हो इतनी दूर ,
जो सुन सको मेरी बोली,
बड़ी याद आती है तेरी वो सूरत भोली,
हे भगवन,तेरे द्वारे फैलाता हूँ झोली,
लौटा दे मुझको वो जिनकी सूरत थी भोली,
मन की ये आस हरी,
दिल की ये टीस हरी,
नैनों में है तेरी छवि.
पर तू अब न लौटोगी कभी,
भगवान् करे तुझे मिल जाये मुझ सा !
समझूंगा जीवन का अब दर्द रहा कैसा !
कहतें हैं मेहनत का फल मीठा होता है ,
जो भी खोजो वो मिलता है,
तुझको मै ढूढू कहाँ ?
बहुत बड़ा है ये जहां !
प्रिय तुमको मेरी कसम !
बता दो न तुम हो कहाँ !!
--------------*विकास *-------

अकेला

आसमान अनंत है !
उगते सूरज के नीचे,
जन सागर है,
फिर भी पाता,
अपने को,
अकेला,
अपरिचित !
क्योंकि मेरे पास ,
न धन है न दौलत है !
न अधिकार है न चालाकी !
और मैंने,
न झुकना सिखा है !
न तारीफ करना !
न अपने को बेचना !
मेरे साथ ,
सिर्फ सपने !
जो हैं मेरे अपने !!

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विकास कुमार

Tuesday, May 25, 2010

*सात पहाड़ों के पार *

तुम कहाँ हो ?
हम तुम्हें ढूंढा करते हैं...
हर ख़ुशी के क्षण..
तुम्हें याद कर लिया करते हैं !
काश ! मै यह जान पाता !
तुम भी मेरी तरह सपने देखा करती हो
चाँद को धरती पर लाने की कोशिश किया करती हो !
बिछी पलकें ,निराश मन !
तेरे ही इंतज़ार में व्यस्त है !
ना जाने कब किस दिशा से..?
दोस्ती का हाँथ बढ़ाती हो !
बादलों की ओट पीछे क्या तू ही शर्माती हो ?
चुपके से कह दो न कब तलक तू आती हो..?
मेरे जीवन का बस यही सार ...
तुझे ढूँढ़ लाऊंगा चाहे , मुझे क्यों न जाना पड़े...
*****सात पहाड़ों के पार********
@Vikas Mehta