Sunday, July 17, 2011

****गुफ्तुगू ****

खुद ही खुद से उलझता चला गया ,
जितना सुलझाया जीवन को !
जो राह बनाया चलने को,
राहें बन अभिसप्त लगी दरकने को !
जब भी किया संकल्प,
कुछ जीवन में ओज भरने को !
मन हरा दिल टुटा लगे तारे छिटकने को
हरयाली देखी....
दौड़ लगाया पाने को,
निराश हुआ पाया मृगतृष्णा को !
नभ की और उठे हाँथ.........
ऊंचाई पाने को !
बाहें छोटी पर गयी,
खोया आत्मविश्वास,घुटने टेके
आँखे थक गयी संबल पाने को !
खिले पुष्प लगे कुम्हलाने,
भ्रमर उड़े नया ठौर पाने को !
शाखों के पत्ते रह गए वहीँ,
फल चले गए शहरी बन जाने को !
निष्ठुर जीवन के भाव लिए,
मै लौट चला घर सुस्ताने को ....!
निष्ठुर जीवन के भाव लिए,
मै लौट चला घर सुस्ताने को......!!

1 comment:

suman said...

Hello sir,bahut achhi kavita....