मुदत्तें बीत गयी तुम्हारी आवाज आज भी कानों में गूंजती है !
शुक्रगुजार हूँ मैं उन तमाम अवसरों का,
जिसने मुझे मुझसे मिलाया
ताउम्र विनम्र और शांत रहना सिखाया !
गर हम तुमसे न मिले होते
एक अनोखे अनुभव से चुक गए होते !
तुम नहीं हो अब और होने की खुशफहमी भी है,
अब पहले से ज्यादा जिन्दगी लगती हसीन है !
तुम थी कितनी समझदार जो कर गयी इनकार,
बता गई इस राह में कांटें हैं बेशुमार !
आज भी हम उन उसूलों के पक्के हैं,
प्यार वाली राह छोड़ बढ़ चले मंजिल की ओर !
सजदे की मूरत फिर कभी मुड़ कर नहीं देखें है !!
यह अहम् नहीं मेरा न त्याग कहें,
जिसका न आदि न अंत कुछ ऐसा प्यार कहें !!
~~विकास~~
जमशेदपुर
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