Friday, August 30, 2013

~खोया हुआ सा कुछ~

मुदत्तें बीत गयी
तुम्हारी आवाज आज भी कानों में गूंजती है !
 

शुक्रगुजार हूँ मैं उन तमाम अवसरों का,
जिसने मुझे मुझसे मिलाया
ताउम्र विनम्र और शांत रहना सिखाया !
 

गर हम तुमसे न मिले होते
एक अनोखे अनुभव से चुक गए होते !
 

तुम नहीं हो अब और होने की खुशफहमी भी है,
अब पहले से ज्यादा जिन्दगी लगती हसीन है !
 

तुम थी कितनी समझदार जो कर गयी इनकार,
बता गई इस राह में कांटें हैं बेशुमार !
 

आज भी हम उन उसूलों के पक्के हैं,
प्यार वाली राह छोड़ बढ़ चले मंजिल की ओर !
सजदे की मूरत फिर कभी मुड़ कर नहीं देखें है !!
 

यह अहम् नहीं मेरा न त्याग कहें,
जिसका न आदि न अंत कुछ ऐसा प्यार कहें !!
                                  ~~विकास~~ 

                                    जमशेदपुर

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